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मंगलवार, 22 नवंबर 2011

पाठ-1 राजस्थानी भाषा रो जलम

                            पाठ-1 राजस्थानी भाषा रो जलम
                                 [] ओम पुरोहित 'कागद'
 राजस्थानी भाषा भोत जूनी भाषा । राजस्थानी भाषा रै जलम रो ठीक-ठीक ग्यान किणी भाषा विग्यानी नै नीं ! श्री राहुल सांकृत्यायन इण रो जलम सातवैं सईकै [सम्वत- 690] रै ऐड़गेड़ बतावै आपरी बात री साख में बै जूना कवि सरहद पाद री सम्वत- 690 लिख्योडी़ आ रचना राखै-

जहि मन पवन संचरई , रवि ससि नाहिं पावेस ।
तहि वह चित विसाय , करु सरह...ै- कहिय उवेस ॥

डा सुनीति कुमार चटर्जी राजस्थानी भाषा रो जलम नवमै सईकै सूं मानै ! आपरी बात री साख में बै  सम्वत-830 में कव लुहिया री लिख्योडी़ ऐ ओळ्यां राखै-

कागा तरुवर पंच विडाल , चंचल चीए पाइये काल ।
दिअ करिअ महासुद परमाण,लूई-भनई गुरू पच्छि अजाण ।

इटली रा विद्वान डा. एल.पी टैसीटोरी अर अंग्रेज विद्वान आचार्य ग्रियर्सन रो मानणोंहै कै राजस्थानी भाषा रो जलम 16  वैं सईकै में होयो । आं रो मानणों है कै सोळवैं सईकै ताईं राजस्थानी अर गुजराती एक ई ही अनै अठै सूं गुजराती राजस्थानी सूं अळगी फ़ंटणीं सरु होयगी ही  ।
विद्वानां रो मानणों है कै सिंध-गुजरात-अर मारवाड़ रै भेळप में कदै ई एक निरवाळो देस हो जिण रो नांव गुर्जरत्रा  [ गुर्जर-गोत्रा ]  यानी गुर्जर लोकां रो देस  । विद्वानां राजनीति री दीठ सूं भी राजस्थान नै पंजाब,गुजरात अर सिंध सूं घणों नेडो़ मानै ।

अंग्रेज विद्वान आचार्य ग्रियर्सन रो दियोडो़ भाषा वंश वृक्ष
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वैदिक
   ।
A-प्राकृत      B-पारसी-      C-जिन्द     D-जर्मनी
   ।
A-मागधी     B-सोरसैनी    C-अपभ्रंश    D-बंगाली     E-पैशाची   F-पाली
                                                 ।
                                          A-डींगल [ पुरानी राजस्थानी ]              B-गुजराती   C-मराठी
                                                 ।
                                        आज री राजस्थानी 

राजस्थानी भाषा रो कडू़म्बो
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अंग्रेज विद्वान आचार्य ग्रियर्सन राजस्थानी भाषा रै कडू़म्बो री बोल्यां रो बंटवारो ईण भांत करियो-
1-आथूणी राजस्थानी= मारवाडी़,थळी,बीकानेरी,बागडी़,शेखावाटी ,मेवाडी,वागडी़,खैराडी़,गोडवाडी़, अर देवडा़वाडी़
2-उगमती राजस्थानी=अहीरवाटी अर मेवाती
3-मध्यपूर्वी राजस्थानी=ढूंढाडी़,तोरावाटी,जयपुरी,कठेडी़,राजावाटी,अजमेरी, किशनगढी, शाहपुरी, अर हाडो़ती
4-दिखणाद-अगूणीं राजस्थानी=मालवी, रांगडी़ अर सोड्वाडी़
5-दिखणादी राजस्थानी=निमाडी़
6- भीली,पहाडी़ अर खानाबदोसी

राजस्थानी भाषा रो छेतर
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आज रो समूळो राजस्थान अर दिखणाद में सतपुडा़ रा ढाळ अर ताप्ती नदी ताईं , आगूणीं दिस में केतकी नदी री ऊपरी धारा सूं आथूण में उमरकोट समेत सिंध नदी री आगूणीं धारा ताईं रो समूळो छेतर  राजस्थानी री बोल्यां बोलण आळां रो छेतर हो ! --

 [] ओम पुरोहित 'कागद'
    24 -दुर्गा कोलोनी
   हनुमानगढ़ संगम - 335512 [ राजस्थान ]
  खूंजे रो खुणखुणियों - 09414380571

रविवार, 13 नवंबर 2011

बच्चों की जुबान काटकर राष्ट्र के चरणों में रखी

राजस्थानी भाषी लोग जब भी अपनी मातृभाषा को आठवीं अनुसूची में शामिल करने अथवा प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा राजस्थानी में देने की गुहार करते हैं, तो न जाने क्यों गैर राजस्थानी भाषी चिंतित हो जाते हैं। जबकि राजस्थान में उनकी संख्या नगण्य है। बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व गुजरात आदि प्रान्तों में रहने वाला राजस्थानी भाषी वहां कभी प्रतिकार करता नजर नहीं आता। सर्वविदित है कि बंगाल, आसाम, महाराष्ट्र, आंध्रप्रदेश व गुजरात में राजस्थानी भाषियों का संख्या बल कम नहीं है। राजस्थानी भाषी जहां भी रहता है, वहां प्रतिकार नहीं करता, अपितु वहां समरस हो जाता है। यह बात राजस्थान में रहने वाले गैर राजस्थानी भाषियों ने आज तक नहीं सीखी। इन लोगों की जो भी मातृभाषा है, उसका हम सम्मान करते हैं। उनकी भाषा से प्रान्त में हमारा कोई विरोध नहीं है। वे अपनी मातृभाषा के हित में बात करें। हम उनके साथ हैं, मगर इस कीमत पर नहीं कि हम अपनी मातृभाषा को भाषा ही न मानें और आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विचार छोड़ दें। राजस्थानी भाषा को भाषा न मानने वाले व इसको आठवीं अनुसूची में शामिल करने का विरोध करने वाले वे मुट्ठी भर लोग हैं, जिनके पूर्वजों को राजस्थान के रजवाड़ों ने अपने यहां हिन्दी के प्रचार-प्रसार के निमित्त सम्मान से बुलवाया था। उस समय हिन्दी को राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित करने का जिम्मा रजवाड़ों ने आगे बढ़कर उठाया था। उस काल में राजस्थान के समस्त रजवाडों में राजकाज, शिक्षा, पट्टे, परवाने, हुण्डी आदि सब राजस्थानी भाषा में होते थे। इसके प्रमाण राजस्थानी के प्राचीन ग्रंथागारों-संग्रहालयों में देखे जा सकते हैं।
अन्य प्रदेशों से आए हिन्दी के विद्वानों व अध्यापकों ने जयपुर, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, अजमेर, उदयपुर, चित्तौड़, भरतपुर, डूंगरपुर, धौलपुर, बांसवाड़ा, नागौर आदि में डेरे डाले व राष्ट्रभाषा हिन्दी का प्रचार-प्रसार किया तथा विद्यालयों में हिन्दी की शिक्षा दी। तब तक इन समस्त रजवाड़ों में राजस्थानी भाषा में ही पढ़ाया जाता था। इन विद्वानों को रजवाड़ों ने भूमि के पट्टे, ताम्रपत्र, मंदिर-माफी की भूमि के परवाने दिए, जो आज भी इन विद्वानों के घरों में देखे जा सकते हैं। ये विद्वान जिन घरों में बैठते हैं, यदि वे घर रियासत काल के हैं तो उनके पट्टे पढ़ लें। उसमें मिल जाएगी राजस्थानी भाषा।
आजादी के बाद जब भाषा के आधार पर प्रान्त बने तो अन्य भाषाई प्रान्तों की तरह राजस्थानी भाषा के आधार पर हमारा राजस्थान बना। उस समय प्रान्तीय भाषाओं को द्वितीय राजभाषा का दर्जा दिया जाने लगा। मराठी, तमिल, तेलुगु, उडिय़ा, मलयालम, गुजराती, कश्मीरी, पंजाबी, उर्दू आदि भाषाएं प्रान्तीय भाषाएं बनीं तो हमारे तत्कालीन राष्ट्रीय नेताओं को हिन्दी सिमटती नजर आई। उन्होंने राजस्थान के नेताओं से अपील की कि आप कुछ वर्ष रुक जाओ। जब हिन्दी राष्ट्रभाषा के रूप में स्थापित हो जाएगी जब राजस्थानी भाषा को आठवीं अनुसूची में डालकर राज्य की द्वितीय राजभाषा बना दी जाएगी।

गिण अर दे दो सीधो


एक बार एक बामण सीधो लेवण ने गयो हो .. बणियो जितरा मिनख हुवता उण हिसाब उं तोल र सीधो देवतो .. बणियो पूछियो भाई कित्ता मिनख हो घर में ??
बामण बोलीयो
हूँ, ण हुंकार दास ,छोरो ,ण गोपाल दास ,छोरो अर छोरा री माँ ,गिगो अर वा . म्हने तो थें जाणो ही हो अबे कीतर मिनख हुया .. गिण अर दे दो सीधो